Wednesday, 4 November 2026
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NIT Jaipur Graduate, Retired Coal India Manager Returns To College At 68 To Study Psychology – Jagran Josh

NIT Jaipur Graduate, Retired Coal India Manager Returns To College At 68 To Study Psychology – Jagran Josh — editorial illustration

NIT Jaipur Graduate,: NIT Jaipur Graduate, Retired Coal India Manager Returns To College At 68 To Study Psychology  Jagran Josh

शिक्षा की कोई उम्र नहीं: 68 वर्ष की आयु में कॉलेज लौटे पूर्व कोल इंडिया मैनेजर

सीखने की प्रक्रिया कभी समाप्त नहीं होती, और इस बात को राजस्थान के एक बुजुर्ग ने चरितार्थ कर दिखाया है। NIT जयपुर ग्रेजुएट और कोल इंडिया के एक सेवानिवृत्त मैनेजर ने 68 वर्ष की आयु में फिर से कॉलेज की दहलीज पर कदम रखा है। उनका यह निर्णय न केवल उनके व्यक्तिगत विकास की दिशा में एक बड़ा कदम है, बल्कि यह समाज के उन तमाम लोगों के लिए भी एक प्रेरणा है जो उम्र को सीखने में बाधा मानते हैं।

खबर का संक्षिप्त विवरण

हाल ही में सामने आई एक रिपोर्ट के अनुसार, मालवीय राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (NIT), जयपुर के एक पूर्व छात्र, जिन्होंने कोल इंडिया में एक लंबे और सफल करियर के बाद प्रबंधन पद से सेवानिवृत्ति प्राप्त की थी, अब मनोविज्ञान (Psychology) विषय की पढ़ाई करने के लिए कॉलेज वापस आ गए हैं। 68 वर्ष की आयु में एक छात्र के रूप में उनकी वापसी ने शिक्षा जगत और सोशल मीडिया पर काफी ध्यान आकर्षित किया है। उनका उद्देश्य इस उम्र में मानव व्यवहार और मानसिक स्वास्थ्य की बारीकियों को समझना है।

NIT जयपुर ग्रेजुएट का शैक्षणिक सफर

इस छात्र की शैक्षणिक पृष्ठभूमि काफी मजबूत रही है। उन्होंने दशकों पहले NIT जयपुर (जिसे पहले MREC के नाम से जाना जाता था) से अपनी इंजीनियरिंग की डिग्री पूरी की थी। एक प्रतिष्ठित संस्थान से स्नातक होने के बाद, उन्होंने तकनीकी और प्रबंधकीय क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई। अब, इंजीनियरिंग के जटिल समीकरणों से निकलकर वे मनोविज्ञान के मानवीय पहलुओं को समझने की कोशिश कर रहे हैं।

एक NIT जयपुर ग्रेजुएट के लिए तकनीकी क्षेत्र से पूरी तरह अलग हटकर मानविकी (Humanities) के विषय को चुनना यह दर्शाता है कि ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती। यह बदलाव उनके बौद्धिक लचीलेपन और नई चीजों को अपनाने की उनकी क्षमता को उजागर करता है।

कोल इंडिया में लंबा अनुभव और सेवानिवृत्ति

अपनी नई शैक्षणिक पारी शुरू करने से पहले, उन्होंने कोल इंडिया लिमिटेड जैसी महारत्न कंपनी में एक महत्वपूर्ण कार्यकाल बिताया। एक मैनेजर के रूप में, उन्होंने वर्षों तक टीम प्रबंधन, परिचालन और रणनीतिक निर्णय लेने का कार्य किया। सेवानिवृत्ति के बाद, जहाँ अधिकांश लोग आराम का जीवन चुनते हैं, उन्होंने अपनी अधूरी जिज्ञासाओं को पूरा करने का मार्ग चुना।

कोल इंडिया में उनके अनुभव ने उन्हें संभवतः लोगों के साथ काम करने और उनके व्यवहार को समझने का एक व्यावहारिक दृष्टिकोण दिया होगा। अब वे उसी अनुभव को मनोविज्ञान के सिद्धांतों के साथ जोड़कर एक नया दृष्टिकोण विकसित करना चाहते हैं।

मनोविज्ञान विषय का चुनाव क्यों?

68 वर्ष की आयु में मनोविज्ञान को चुनने के पीछे कई गहरे कारण हो सकते हैं। मनोविज्ञान एक ऐसा विषय है जो हमें स्वयं को और दूसरों को बेहतर ढंग से समझने में मदद करता है। सेवानिवृत्ति के बाद, कई लोग समाज सेवा या परामर्श (Counseling) के क्षेत्र में जाना चाहते हैं, जिसके लिए मनोविज्ञान का ज्ञान अत्यंत लाभकारी सिद्ध होता है।

  • मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता: वर्तमान समय में मानसिक स्वास्थ्य एक गंभीर विषय है, और इसे समझने की इच्छा किसी भी उम्र में हो सकती है।
  • स्वयं की खोज: जीवन के इस पड़ाव पर, व्यक्ति अक्सर जीवन के अर्थ और मानवीय संवेदनाओं के बारे में अधिक गहराई से सोचना शुरू करता है।
  • सामाजिक योगदान: मनोविज्ञान की डिग्री प्राप्त करने के बाद, वे समाज के बुजुर्गों या युवाओं को बेहतर मार्गदर्शन देने में सक्षम हो सकते हैं।

आजीवन सीखने की कला (Lifelong Learning)

यह मामला ‘लाइफलॉन्ग लर्निंग’ के विचार को पुष्ट करता है। भारत में अक्सर यह माना जाता है कि पढ़ाई केवल करियर बनाने के लिए की जाती है। लेकिन यह उदाहरण बताता है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी पाना नहीं, बल्कि ज्ञान का विस्तार करना भी है। एक पूर्व मैनेजर का छात्र बनना यह संदेश देता है कि सीखने की भूख आपको हमेशा युवा बनाए रखती है।

कॉलेज के वातावरण में, जहाँ उनके सहपाठी उनकी पोते-पोतियों की उम्र के होंगे, उनका वहां होना अंतर-पीढ़ीगत शिक्षा (Inter-generational learning) को भी बढ़ावा देता है। युवा छात्र उनके अनुभव से सीख सकते हैं, जबकि वे युवाओं के आधुनिक दृष्टिकोण से परिचित हो सकते हैं।

समाज के लिए एक बड़ी मिसाल

भारतीय समाज में अक्सर 60 वर्ष की आयु के बाद सक्रिय शैक्षणिक जीवन को समाप्त मान लिया जाता है। लोग धार्मिक गतिविधियों या पारिवारिक जिम्मेदारियों तक सीमित हो जाते हैं। हालांकि, इस 68 वर्षीय छात्र ने इस रूढ़ि को तोड़ा है। उनका यह कदम उन लोगों के लिए एक प्रोत्साहन है जो अपनी अधूरी इच्छाओं को ‘बहुत देर हो गई’ कहकर दबा देते हैं।

सत्यापित विवरण

विवरण जानकारी
छात्र की आयु 68 वर्ष
पूर्व संस्थान NIT जयपुर (MREC)
पूर्व कार्यक्षेत्र रिटायर्ड मैनेजर, कोल इंडिया
वर्तमान विषय मनोविज्ञान (Psychology)

क्या है अनपुष्ट और शेष?

हालांकि यह खबर अत्यंत प्रेरणादायक है, लेकिन कुछ विवरण अभी भी स्पष्ट नहीं हैं। वर्तमान में यह जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है कि वे किस विशेष कॉलेज या विश्वविद्यालय में दाखिला ले रहे हैं। साथ ही, क्या वे इस विषय में केवल स्नातक (Bachelor’s) कर रहे हैं या सीधे स्नातकोत्तर (Master’s) या किसी डिप्लोमा कोर्स में शामिल हुए हैं, इसकी पुष्टि होना बाकी है। उनके भविष्य के लक्ष्यों—जैसे कि क्या वे प्रैक्टिसिंग साइकोलॉजिस्ट बनना चाहते हैं या केवल ज्ञान के लिए पढ़ रहे हैं—के बारे में भी विस्तृत जानकारी की प्रतीक्षा है।

पाठकों के लिए मुख्य सबक

इस समाचार से हमें कई महत्वपूर्ण बातें सीखने को मिलती हैं, जो हमारे जीवन के प्रति दृष्टिकोण को बदल सकती हैं:

  • उम्र केवल एक संख्या है: यदि आपके पास कुछ नया सीखने का जज्बा है, तो उम्र कभी भी आपके रास्ते में नहीं आ सकती।
  • करियर के बाद का जीवन: सेवानिवृत्ति का अर्थ सक्रिय जीवन का अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है।
  • विषय का महत्व: तकनीकी पृष्ठभूमि होने के बावजूद मानवीय विषयों में रुचि लेना आपके व्यक्तित्व को पूर्णता प्रदान करता है।
  • साहस: एक ऐसी उम्र में फिर से परीक्षा और असाइनमेंट के दौर से गुजरना, जब लोग शांति चाहते हैं, बड़े साहस का काम है।

अंत में, यह कहानी हमें याद दिलाती है कि जिज्ञासा ही वह ईंधन है जो जीवन की गाड़ी को अंत तक चलाती रहती है। चाहे आप 18 के हों या 68 के, सीखने का द्वार हमेशा खुला रहता है।

इंजीनियरिंग और मनोविज्ञान: एक वैचारिक परिवर्तन

एक इंजीनियर का मस्तिष्क आमतौर पर तर्क, डेटा और संरचनात्मक समाधानों पर केंद्रित होता है। एनआईटी (NIT) जयपुर, जिसे पहले मालवीय क्षेत्रीय इंजीनियरिंग कॉलेज (MREC) के नाम से जाना जाता था, वहां से शिक्षा प्राप्त करने वाले व्यक्ति के लिए जीवन के अधिकांश निर्णय गणितीय सटीकता और तकनीकी व्यवहार्यता पर आधारित रहे होंगे। हालांकि, 68 वर्ष की आयु में मनोविज्ञान की ओर रुख करना यह दर्शाता है कि व्यक्ति अब ‘मशीनों और प्रणालियों’ के बजाय ‘मनुष्य और उसकी अनुभूतियों’ को प्राथमिकता दे रहा है। यह बदलाव केवल एक विषय का परिवर्तन नहीं है, बल्कि यह दुनिया को देखने के नजरिए में एक बड़ा वैचारिक बदलाव है।

मनोविज्ञान के क्षेत्र में कदम रखकर, यह पूर्व प्रबंधक संभवतः उन अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर खोज रहे हैं जो एक लंबे पेशेवर जीवन के दौरान उनके मन में उपजे होंगे। इंजीनियरिंग जहाँ बाहरी दुनिया के भौतिक निर्माण पर ध्यान केंद्रित करती है, वहीं मनोविज्ञान आंतरिक जगत की परतों को खोलता है। एक वरिष्ठ नागरिक के लिए, यह अध्ययन उनके जीवन के संचित अनुभवों को एक वैज्ञानिक और शैक्षणिक ढांचा प्रदान करने का माध्यम बन सकता है।

कॉर्पोरेट अनुभव का शैक्षणिक लाभ

कोल इंडिया लिमिटेड जैसी महारत्न कंपनी में एक प्रबंधक के रूप में काम करते हुए, उन्होंने हजारों कर्मचारियों, श्रमिक संघों और जटिल प्रशासनिक चुनौतियों का सामना किया होगा। एक सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (PSU) में प्रबंधन का कार्य केवल फाइलों तक सीमित नहीं होता, बल्कि इसमें लोगों की भावनाओं, उनकी कार्यक्षमता और कार्यस्थल की परिस्थितियों को समझना भी शामिल होता है।

व्यावहारिक ज्ञान और मनोवैज्ञानिक सिद्धांत

  • संगठनात्मक व्यवहार: दशकों तक टीमों का नेतृत्व करने के बाद, वे अब ‘ऑर्गनाइजेशनल बिहेवियर’ के सिद्धांतों को किताबी रूप में बेहतर समझ पाएंगे और उन्हें अपने अनुभवों से जोड़ सकेंगे।
  • तनाव और संकट प्रबंधन: खनन जैसे चुनौतीपूर्ण और जोखिम भरे क्षेत्र में काम करने के दौरान उन्होंने जो दबाव झेला होगा, उसका विश्लेषण अब वे मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से करने में सक्षम होंगे।
  • मानवीय संवेदनाएं: एक प्रबंधक के रूप में उन्होंने लोगों को काम करते देखा है, अब एक छात्र के रूप में वे यह समझेंगे कि लोग उस तरह से व्यवहार क्यों करते हैं।

वरिष्ठ नागरिकों के लिए शिक्षा के नए द्वार

भारत में उच्च शिक्षा को अक्सर करियर निर्माण और युवाओं के क्षेत्र के रूप में देखा जाता है, लेकिन यह मामला इस पारंपरिक धारणा को कड़ी चुनौती देता है। 68 वर्ष की आयु में कॉलेज परिसर में छात्र के रूप में लौटना न केवल व्यक्तिगत साहस का काम है, बल्कि यह भारतीय शिक्षा संस्थानों की समावेशिता पर भी ध्यान केंद्रित करता है। यह उदाहरण इस वैश्विक चर्चा को बल देता है कि शिक्षा को उम्र की सीमाओं से पूरी तरह मुक्त होना चाहिए।

जब एक अनुभवी व्यक्ति कक्षा में बैठता है, तो वह अपने साथ व्यावहारिक ज्ञान का एक विशाल भंडार लेकर आता है। इससे न केवल उन्हें स्वयं लाभ होता है, बल्कि उनके साथ पढ़ने वाले युवा छात्रों को भी जीवन के वास्तविक अनुभवों से रूबरू होने का मौका मिलता है। यह ‘इंटर-जनरेशनल लर्निंग’ का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जहाँ पीढ़ियों के बीच का अंतर कम होता है और ज्ञान का आदान-प्रदान दोनों दिशाओं में होता है।

बौद्धिक सक्रियता और मानसिक स्वास्थ्य

सेवानिवृत्ति के बाद अक्सर लोग मानसिक शिथिलता का शिकार हो जाते हैं, जिसे ‘कॉग्निटिव डिक्लाइन’ कहा जाता है। मनोविज्ञान का अध्ययन करना मस्तिष्क को सक्रिय रखने का एक वैज्ञानिक तरीका है। नई अवधारणाओं को सीखना, शोध करना और शैक्षणिक चर्चाओं में भाग लेना मानसिक स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी है। यह कदम यह भी रेखांकित करता है कि सेवानिवृत्ति का अर्थ सक्रिय जीवन का अंत नहीं, बल्कि एक नई और अर्थपूर्ण शुरुआत हो सकती है। यह कहानी हमें याद दिलाती है कि सीखने की ललक आपको मानसिक रूप से हमेशा युवा बनाए रखती है।

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